ख्यबो की किश्तियों पर बैठी,
उम्मीदों के समुंदर से जा रही थी।
रास्ते में इश्क़ की एक भँवर दिखी,
और जोश में उसमें तैरने का मन हुआ
जब उससे तैरकेर बाहर आयी,
तो कुछ घटा हुआ सा महसूस हुआ ।
रास्ते में तो अभी भी चल रही थी
पर लगा की कोई पीछे से पुकार रहा
मैं मुड़ी कई बार, पीछे गयी भी
और हर बार दिल तेज धड़कता रहा।
कोई ना मिला कभी ना मिला, और ना मिलेगा
ये मैं अपने मन को समझाती रही।
कैसा पागलपन है उस इश्क़ के भँवर का
आज भी मन वही अटका हुआ है
नियति नही वो मेरी, सिर्फ़ सपना है
ये मन समझता ही नही है।
No comments:
Post a Comment