मैं मिली तुमसे अपनी सारी आभा खो कर,
इस संसार के रीत रिवाजों को छोड़कर।
हँसना, रोना और रूठना सब भूली हूँ
तुमको मन में रखकर, लगता है कि बस पूरी हूँ
क्यू फँसा दिया मुझक, तुमने इस दुविधा में?
सोना, खाना सब छूटा है रात और दिन में।
अब कोई कुंती या अहिल्या की कहानी ना सुनते,
लोग तो बस इन्हें चरित्रहीन समझते और ऐसे प्रेम को पाप बताते।।
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